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Wednesday, 25 October 2017

शेर का थप्पड़

एक ब्राह्मण देवता थे | बड़े गरीब और सीधे थे | देश में अकाल पड़ा | अब भला ब्राह्मण को कौन सीधा दे और कौन उनसे पूजा - पाठ करावे | बेचारे ब्राह्मण  को कई दिनों तक भोजन नहि मिला |
ब्राह्मण ने सोचा -' भूख से मरने से तो प्राण दे देना ठीक है |'

वे जंगल में मरने के विचार से गए | मरने के पहले  उन्होंने शुद्ध हिर्दय से भगवान का नाम लिया और प्रार्थना की | इतने में एक शेर दिखाई पड़ा | ब्राह्मण  ने सोचा- 'भूख से मरने से तो प्राण दे देना ठीक है |'
वे जंगल में मरने के विचार से गए | मरने के पहले उन्होंने शुद्ध हिर्दय से भगवान का नाम लिया और प्रार्थना की |  
इतने में एक शेर दिखाई पड़ा | ब्राह्मण ने कहा- 'मैं तो मरने आया ही था | यह मुझे खा ले तो अच्छा |' शेर ने पास आकर पूछा- 'तू डरता क्यों नही?'

ब्राह्मण ने सब बातें बताकर कहा- 'अब तुम मुझे झटपट मारकर खा डालो |' सच्ची बात यह थी कि उस वन के देवता को ब्राह्मण पर दया आ गयी थी | वही शेर बनकर आया था | उसने ब्राह्मण दया आ गयी थी | वही शेर बनकर आया था | उसने ब्राह्मण को पांच सौ अशर्फिया दीं | ब्राह्मण घर लौट आया | सबेरे जब ब्राह्मण अशर्फी कहाँ मिली ? ब्राह्मण ने सच्ची बात बता दीं और वह आटा - चावल आदि लेकर घर आ गया |
बनिया बड़ा लोभी था | वह रात को अशर्फिया  के  लोभ से वन में गया | उसने भी जीभ से भगवान का नाम लिया और प्रार्थना की | शेर आया | बनिये कहाँ- 'तुम झटपट मुझे खाकर पेट भर लो |'

शेर ने कहा - 'मैं तेरे - जैसे लोभी को अवश्य खा जाता | पर किसी भी बहाने भगवान का नाम लिया ही है, अतः तुझे मारूंगा नहीं; केवल थोड़ा - सा दंड दूंगा |'
शेर ने बनिये को एक पंजा मारा | उसका एक कान चिथड़े-चिथड़े  होकर उड़ गया | एक आंख फूट गयी | उसे लोभ का यही पुरस्कार मिला |
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Tuesday, 24 October 2017

भगवान का भरोसा

जाड़े का दिन था और शाम हो गयी थी | आसमानो में बादल छाये थे | एक नीम के पेड़ पर बहुत  से कौए बैठे थे | वे सब बार बार काँव-काँव  कर रहे थे और एक दूसरे से झगड़ भी रहे थे | इसी समय एक छोटी मैना आयी और उसी नीम के पेड़ की एक डाल पर बैठ गयी | मैना को देखते ही कई कौए उस पर टूट पड़े | बेचारी मैना ने कहा -'बादल बहुत है ; इसलिये आज जल्दी अँधेरा हो गया है | मैं अपना घोंसला भूल गयी हूँ | मुझे आज रात यहाँ बैठे रहने दो |'

कोयो ने कहा- नहीं , यह पेड़ हमारा है | तू यह से भाग जा |'

मैना बोली -'पेड़ तो सब भगवान के है | इस सर्दी मैं  यदि वर्षा  हुई और ओले पड़े तो भगवान ही हम लोगो के प्राण बचा सकते है | मैं बहुत छोटी हूँ, तुम्हारी बहन हूँ , मुझ पर तुम लोग दया करो और मुझे भी यह बैठने दो ' कोयो ने  कहा - हमें तेरी -जैसी बहन नहीं चाहिए | तू  बहुत  भगवान का नाम लेती है  तो भगवान के भरोसे यहां से चली क्यों  नहीं जाती | तू नहीं जायेगी तो हम सब तुझे मारेंगे |

कौए तो झगड़ालू होते है  ही, वे शाम को जब पेड़ पर बैठने लगते है, तब आपस मैं झगड़ा किये बिना उनसे रहा नहीं जाता | वे एक - दूसरे  को मारते हैं  और काँव - काँव कर के झगड़ते हैं | कौन  कोया किस टहनी पर रात को बैठेगा यह कोई झटपट तै नहीं हो जाता | उनमे बार - बार लड़ाई होती है, फिर किसी दूसरी चिड़िया को अपने पेड़ पर तो बैठने ही कैसे दे सकते थे | आपस की लड़ाई छोड़कर वे मैना को मारने दौड़े |
कोयो को काँव - काँव कर के अपनी और झपटते देख कर बेचारी मैना वहां से उड़ गयी और थोड़ी दूर जाकर एक आम के पेड़ पर बैठ गयी |

रात को आँधी आयी | बादल गरजे और बड़े - बड़े ओले पड़ने लगे | बड़े आलू - जैसे ओले ताड - तड़ - तड़, भड़ - भड़ बंदूक़  की गोली - जैसे पड़ रहे थे | कौए काँव - काँव कर के चिल्लाये; इधर से  उधर थोड़ा उड़े;  परन्तु  ओले की मार से सब के सब घायल होकर जमीन गिर पड़े | बहुत - से कौए मर गये | मैना जिस आम पर बैठी थी, उसकी एक मोटी डाल आँधी में टूट गयी | डाल भीतर से सड़ गयी थी और पोली हो गयी थी | डाल टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़ में एक खोंडर हो गया | छोटी मैना उसमें घुस गयी | उसे एक भी ओला नहीं लगा |
सबेरा हुआ, दो घडी दिन चढ़ने पर चमकीली धूप निकली | 

मैना खोंडर में से निकली, पंख फैलाकर चहक कर उसने भगवान प्रणाम किया और वह उडी | पृथवी पर ओले से घायल पड़े हुए कौए ने मैना को उड़ते देख कर बड़े कष्ट से कहा - ,'मैना बहन ! तुम कहा रही ? तुम को ओलो की मार से किसने बचाया ?'
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Wednesday, 18 October 2017

जैसा संग वैसा रंग

एक बाजार में एक तोता बेचने वाला आया | उसके पास दो पिंजरे थे | दोनों में एक - एक तोता था | उसने एक तोते का मूल्य रखा था - पांच सौ रूपये और एक का रखा था पांच आने पैसे | वह कहता था की 'कोई पहले पांच आने वाले को लेना चाहे तो ले जाये, लेकिन कोई पहले पांच सौ रूपये वाले को लेना चाहेगा तो उसे दूसरा भी लेना पड़ेगा |'

वहां के राजा बाजार में आये | तोते वाले की पुकार सुन कर उन्होंने हाथी रोक कर पूछा - 'इन दोनों के मूल्यों में इतना अंतर क्यों हैं ?'

तोते वाले ने कहा -'यह तो आप इनको ले जाए तो अपने - आप पता लग जायेगा |' राजा ने तोते ले लिये | जब रात में वे सोने लगे तो उन्होंने कहा की 'पांच सौ रूपये वाल्व तोते का पिंजरा मेरे पलंग के पास टांग दिया जाये |' जैसे ही प्रातः चार बजे, तोते ने कहना आरम्भ किया - 'राम,राम,सीता,राम ! तोते ने खूब सुन्दर भजन गाये | सुन्दर श्लोक पढ़े | राजा बहुत प्रसन्न हुए |

दूसरे दिन उन्होंने दूसरे तोते का पिंजरा पास रखवाया | जैसे ही सबेरा हुआ, उस तोते ने गन्दी - गन्दी गालिया बकनी शुरू कर दी | राजा को क्रोध आया | उन्होंने नौकर से कहा - 'इस दुष्ट को मार डालो |
पहला तोता पास ही था | उसने नम्रता  से प्रार्थना की - राजन ! इसे मारो मत ! यह मेरा सगा भाई हैं | हम दोनों एक साथ जाल में पढ़े थे | मुझे एक संत ने लिया | उनके यह में भजन सीख गया | इसे एक म्लेछने ले लिया | वहां इसने गाली सीख ली | इसका कोई दोष नहीं हैं, यह तो बुरे संग का नतीजा हैं | राजा ने तोते को मारा नहीं, उसे उदा दिया |  
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Monday, 16 October 2017

उसने रामायण पढ़ी होती

हुएन सांगची लाऊ, यही नाम था उसका | पिता उसे सांग कहते थे | जी चाहे तो आप भी इसी नाम से पुकारिये | उसका पिता शिकारी था | रीछ फँसाता, हिरन मारता और फिर उनके चमड़े बेच डालता | यही रोजगार था बाप - दादो से उसके घर का |

एक दिन पिता ने उसे एक बड़े पेड़ की छाया में बैठा दिया और स्वयं बंदूक लेकर एक और जंगल में चला गया | घर में न माँ हैं और न कोई भाई - बहन | इसलिए सूने घर में उसका मन लगता नहीं था | मास्टरजी की बेंतके डर से वह पाठशाला नहीं जाता | दूसरे लड़के पढ़ने चले जाते हैं | भला, गांव में किसके साथ खेले
पिता के साथ रोज जंगल में जाता हैं | कभी चिड़ियों को उडाता हैं, कभी खरगोश पीछे दौड़ता हैं | झरबेरी और झाड़ू कभी-कभी खाने को मिल जाते हैं | वह शिकारी का लड़का हैं | उसे अकेले जंगल में दौड़ने और खेलने में डर नहीं लगता |

एक दिन पिता के चले जाने पार वह घूम रहा था | एक और से 'खो - खो' की आवाज़ आयी | वह देखने दौड़ गया | बड़े - बड़े बालों में कांटे फंसे थे | एक और से कांटे छुड़ाता तो दूसरी और उलझ जाते | रीछ घबरा गया था | लड़के को दया आ गयी | वह पास चला गया | उसने कांटे छुड़ाकर रीछ को छुटकारा दे दिया |

रीछ बड़े जोर से चिल्लाया | लड़के के सामने खड़े होकर  देर तक भल भलभलाता  रहा | लड़का डर रहा था | मुझे खा  न जाय | भाग भी नहीं सकता था | रीछ जाने क्या व्याख्यान दे रहा था | थोड़ी देर में रीछ उलटे भाग गया | लड़के की जान में जान आयी | रीछ किसीपर चिढ़ जाय तो बड़ा भयानक शत्रु होता हैं, वह पेड़ पर भी चिढ़ जाता हैं | लेकिन किसी पर प्रसन्न हों जाय तो मित्र भी बहुत अच्छा होता हैं | अपने पर उपकार करने वाले का उपकार  वह भूलता नहीं हैं | जो लोग दूसरे प्राणियों पर दया करते हैं, उन्हें उस दया और उपकार का फल भी मिलता हैं | संसार के बहुत - से प्राणी मनुष्य के उपकार का बड़ा सुन्दर बदला उपकार कर  के  चुकाते हैं | रीछ की भाषा लड़का नहीं समझता था | किन्तु रीछ ने उससे कहा था - मैं तुम्हारा मित्र हूँ | मैं तुम्हारे लिये अभी मीठे फल लेकर अत हूँ | लड़का वहां से बहुत दूर भाग जाना चाहता था | वह दौड़ा जा रहा था | वह कुछ ही दूर जा पाया था की रीछ फिर आ गया | अब की बार वह कई सुन्दर - सुन्दर फल लाया था | उसने लड़के के हाथो में फल दे दिए | लड़के ने खाकर  देखा की बहुत मीठे हैं वे फल |

लड़के और रीछ की दोस्ती हों गयी | इस मित्रता से  लड़के का बाप बहुत प्रसन्न था | रीछ लड़के को रोज मीठे - मीठे फल लाकर देता था | लड़का अपने पिता को भी वे फल देता था | एक दिन लड़के ने जंगल में आते ही देखा की उसके मित्र रीछ की आंखे दुखनी आ गयी हैं | वह एक पेड़ के तने से लगकर बैठा हैं और 'हूँ, हूँ' कर के रो रहा हैं | लड़के को हंसी आ गयी | वह ताली बजाकर हसने लगा | रीछ को आया गुस्सा और उसने लड़के की नाक नोच खायी | लड़के की यह दुर्दशा क्यों होती, यदि उसने रामायण पढ़ी होती | यदि उसने रामायण की  शिक्षा ली होती तो उसे पता होता की -

                              जे न मित्र दुःख होही दुखारी |
                              तिन्हैं बिलोकत पातक भारी ||
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